Wednesday, February 11, 2026

देवी कवच (दुर्गा कवच)

 ॐ नमश्‍चण्डिकायै॥

मार्कण्डेय उवाच

यद्‌गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

ब्रह्मोवाच

अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुश्व महामुने ॥ २ ॥

प्रथमं शैलपुत्रीति द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ ३ ॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रिश्च महागौरीति चाष्टमम् ॥ ४ ॥

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥ ५ ॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥ ६ ॥

न तेषां जायते किञ्चित् अशुभं रणसङ्कटे ।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥ ७ ॥

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां सिद्धि: प्रजायते ।
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ॥ ८ ॥

ऐन्द्री गजसमारुढ़ा वैष्णवी गरुडासना ।
माहेश्‍वरी वृषारुढ़ा कौमारी शिखिवाहना ॥ ९ ॥

ब्राह्मी हंससमारुढ़ा सर्वाभरणभूषिता ।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥ १०॥

दृश्यन्ते रथमारुढ़ा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥ ११ ॥

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥ १२॥

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥ १३ ॥

महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ।
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि ॥ १४ ॥

प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ।
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी ॥ १५ ॥

प्रतीच्यां वारुणी रक्षेत् वायव्यां मृगवाहिनी ।
उदीच्यां रक्ष कौबेरी ईशान्यां शूलधारिणी ॥ १६ ॥

ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेत् अधस्ताद् वैष्णवी तथा ।
एवं दश दिशो रक्षेत् चामुण्डा शववाहना ॥ १७ ॥

जया मे चाग्रतः स्तातु विजया स्तातु पृष्ठतः ।
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता ॥ १८ ॥

शिखां मेऽद्योतिनी रक्षेत् उमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ।
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्-यशस्विनी ॥ १९ ॥

त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ।
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ॥ २० ॥

कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ।
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ॥ २१ ॥

अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ।
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठ मध्येतु चण्डिका ॥ २२ ॥

घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ।
कामाक्षी चिबुकं रक्षेत् वाचं मे सर्वमङ्गला ॥ २३ ॥

ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ।
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ॥ २४ ॥

खड्ग्धारिन्यु भौ स्कन्धो बाहू मे वज्रधारिणी ।
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेत् अम्बिका चाङ्गुलीस्त्था ॥ २५ ॥

नखाञ्छूलेश्‍वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेन्नलेश्वरी ।
स्तनौ रक्षेन्महालक्ष्मी: मनः शोकविनाशिनी ॥ २६ ॥

हृदय्म् ललिता देवी उदरम् शूलधारिणी ।
नाभौ च कामिनी रक्षेत् गुह्यं गुह्येश्‍वरी तथा ॥ २७ ॥

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
भूतनाथा च मेद्रं मे ऊरू महिषवाहिनी ॥ २८ ॥

जङ्घे महाबला प्रोक्ता सर्वकाम प्रदायिनी ।
गुल्फयोर्नारसिंही च पादौ चामित-तैजसी ॥ २९ ॥

पादाङ्गुली: श्रीर्मे रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ।
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्‍चैवोर्ध्वकेशिनी ॥ ३० ॥

रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्‍वरी तथा ।
रक्तमज्जावसामांसानि अस्थिमेदांसि पार्वती ॥ ३१ ॥

अन्त्राणि कालरात्रिश्‍च पित्तं च मुकुटेश्‍वरी ।
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूड़ामणिस्तथा ॥ ३२ ॥

ज्वालामुखी नखज्वाला अभेद्या सर्वसंधिषु ।
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेत् छाया छत्रेश्‍वरी तथा ॥ ३३ ॥

अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षमे धर्मचारिणी ।
प्राणापानौ तथा व्यानं समानोदानमेव च ॥ ३४॥

यशः कीर्तिंञ्च लक्ष्मीञ्च सदा रक्षतु वैष्णवी ।
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत् पशून्मे रक्ष चण्डिके ॥ ३५॥

पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मी: र्भार्यां रक्षतु भैरवी
मार्गं क्षेमकरी रक्षेत् वजया सवृतः स्थिता ॥ ३६॥

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ॥ ३७॥

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्राधिगच्छति ॥ ३८॥

तत्र तत्रार्थलाभश्‍च विजयः सार्वकामिकः ।
यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्‍चितम् ॥ ३९॥

परमैश्‍वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ।
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः ॥ ४० ॥

त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ।
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ॥ ४१ ॥

यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ।
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येपपराजितः ॥ ४२ ॥

जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ॥ ४३ ॥

स्थावरं जङ्गमं वापि कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।
आभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ॥ ४४ ॥

भूचराः खेचराश्‍चैव जलजाश्‍चोपदेशिकाः ।
सहजाः कुलजा मालाः शाकिनी डाकिनी तथा ॥ ४५ ॥

अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्‍च महाबलाः ।
ग्रहभूतपिशाचाश्‍च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ॥ ४६ ॥

ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ।
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ॥ ४७ ॥

मानोन्नतिर्भवेद्-राज्ञ: तेजोवृद्धिकरं परम् ।
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले ॥ ४८ ॥

जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ॥ ४९ ॥

तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी ।
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ॥ ५० ॥

प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामाया प्रसादतः ।

Tuesday, February 3, 2026

Shree Durga Chalisa

 नमो नमो दुर्गे सुख करनी नमो नमो अम्बे दुःख हरनी
निरंकार है ज्योति तुम्हारी तिहूं लोक फैली उजियारी
रूप मातु को अधिक सुहावे दरश करत जन अति सुख पावे
शशि ललाट मुख महाविशाला नेत्र लाल भृकुटी विकराला

तुम संसार शक्ति लै कीना पालन हेतु अन्न धन दीनाअन्नपूर्णा हुई जग पाला तुम ही आदि सुन्दरी बालाप्रलयकाल सब नाशन हारी तुम गौरी शिव शंकर प्यारीशिव योगी तुम्हरे गुण गावें ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें
रुप सरस्वती का तुम धारा दे सुबुद्धि ॠषि मुनिन उबाराधरा रूप नरसिंह को अम्बा प्रकट भई फाडकर खम्बारक्षा कर प्रह्लाद बचायो हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायोलक्ष्मी रूप धरो जग माहीं श्री नारायण अंग समाहीं
क्षीरसिन्धु में करत विलासा दयासिन्धु दीजै मन आसाहिंगलाज में तुम्हीं भवानी महिमा अमित न जात बखानीमातंगी धूमावति माता भुवनेश्वरि बगला सुखदाताश्री भैरव तारा जग तारिणि  छिन्न भाल भव दुःख निवारिणि
केहरि वाहन सोह भवानी लांगुर वीर चलत अगवानीकर में खप्पर खड्ग विराजे जाको देख काल डर भागेसोहे कर अस्त्र और त्रिशूला जाते उठत शत्रु हिय शुलानगरकोट में तुम्हीं विराजत तिहूं लोक में डंका बाजत
शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे रक्तबीज शंखन संहारे
महिषासुर नृप अति अभिमानी जेहि अघ भार मही अकुलानीरूप कराल कालिका धारा सैन्य सहित तुम तिहि संहारापरी भीर संतन पर जब जब भई सहाय मातु तुम तब तब
अमरपूरी अरू बासव लोका तब महिमा सब कहें अशोका
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी तुम्हें सदा पूजें नर नारीप्रेम भक्ति से जो यश गावे दुःख दारिद्र निकट नहिं आवेध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई जन्म मरण ते सो छुटि जाई
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी योग न हो बिन शक्ति तुम्हरीशंकर आचारज तप कीनो काम अरु क्रोध जीति सब लीनो 
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को काहु काल नहीं सुमिरो तुमको 
शक्ति रूप को मरम न पायो शक्ति गई तब मन पछतायो
शरणागत हुई कीर्ति बखानी जय जय जय जगदंब भवानीभई प्रसन्न आदि जगदम्बा दई शक्ति नहिं कीन विलंबामोको मातु कष्ट अति घेरो तुम बिन कौन हरै दुःख मेरोआशा तृष्णा निपट सतावें रिपु मूरख मोहे अति दर पावे
शत्रु नाश कीजै महारानी सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानीकरो कृपा हे मातु दयाला ॠद्धि सिद्धि दे करहु निहालाजब लगि जिऊं दया फल पाऊं तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं 
दुर्गा चालीसा जो गावै सब सुख भोग परम पद पावै 
देवीदास शरण निज जानी करहु कृपा जगदम्ब भवानी

Hanuman Chalisa

 

श्री हनुमान चालीसा

·    ॥ दोहा ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
॥ चौपाई ॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर॥
रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै॥
शंकर सुवन केसरी नंदन।। तेज प्रताप महा जगवंदन॥
विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै॥
भूत पिशाच निकट नहिं आवै ।। महावीर जब नाम सुनावै ॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै॥
अंतकाल रघुवरपुर जाई । जहां जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥
॥ दोहा ॥
पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥

Friday, November 28, 2014

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