पं. विजयशंकर मेहता
देखने
की
गुणवत्ता
और
होशपूर्वक
सजगता
से
देखने
की
गुणवत्ता
का
नाम
है
ध्यान।
हमें
एक
बात
ध्यान
रखना
है
कि
ध्यान
का
अर्थ
है
होश।
जो
कुछ
भी
हम
होश
पूर्वक
करते
हैं
वह
ध्यान
है।
ध्यान
का
अर्थ
है
अकेले
होने
का
आनंद।
होशपूवर्ण
काम
मतलब
खाते
समय
बस
खाओ,
इसमें
तल्लीन
रहो,
चलते
समय
बस
चलो
इसमें
तल्लीन
रहो।
उसी
क्षण
में
बने
रहना
चाहिए।
उस
क्षण
के
आगे
न
होना
चाहिए।
यहां
वहां
न
उछलें,
क्यों
मन
या
तो
हमेशा
आगे
चलता
है
या
पीछे
घिसटता
है।
वर्तमान
क्षण
में
टिके
रहो,
यह
ध्यान
है।
ध्यान की कुछ प्रमुख अवस्थाएं हैं विधियां है, जो हमें उचित लगे उसे हमें स्वीकार करना है। एक स्वर्णिम प्रकाश हमारे भीतर और बाहर है, ध्यान इसी से शुरू करते हैं। इसे दिन में कम से कम दो बार करें, सबसे अच्छा समय है सुबह का। ठीक, हमारे बिस्तर से उठने से पहले, जिस क्षण हमें लगे कि हम जाग गए हैं, इसे कम से कम 20 मिनट के लिए किया जाए। सुबह सबसे पहले यही काम करें, बिस्तर से मत उठे, वहीं उसी समय, तत्क्षण इस विधि को करें क्योंकि जब हम नींद से जाग रहे होते हैं तब बहुत नाजुक और संवेदनशील होते हैं, जब हम नींद से बाहर आ रहे होते हैं तब हम बहुत ताजे होते हैं। और इस विधि का प्रभाव बहुत गहरा होता जाएगा।
जिस समय हम नींद से बाहर आ रहे होते हैं उस समय हम सदा की अपेक्षा हम बुद्धि में कम होते हैं। तो कुछ अंतराल है जिनके माध्यम से ध्यान की यह विधि हमारे अन्तरतम सत्व में प्रवेश कर जाएगी। और सुबह-सुबह जब हम जाग रहे होते हैं, पूरी पृथ्वी जाग रही होती है, उस समय पूरे विश्व में जाग रही ऊर्जा, एक विशाल लहर होती है, उस लहर का उपयोग करने वाले अवसर को न चूकें।
सभी प्राचीन धर्म सुबह-सुबह प्रार्थना किया करते थे। जब सूर्य उगता है क्योंकि सूर्य का उगना अस्तित्व में व्याप्त सभी ऊर्जाओं का उदित होना है। इस क्षण में हम उदित होती ऊर्जा की लहर पर सवार हो सकते हैं। यह सरल होगा। शाम तक यह कठिन हो जाएगा, ऊर्जाएं वापस बैठने लगेगी, तब हम धारा के विरूद्ध लडेंगे। सुबह के समय इस धारा के साथ होंगे।
तो इस शुरू करने का सबसे अगछा समय सुबह-सुबह का है। ठीक उस समय जब हम आधे सौए और आधे जागे हुए होते हैं। यह प्रक्रिया बड़ी सरल है। इसके लिए किसी मुद्रा, आसन, स्नान आदि की जरूरत नहीं है।
हम अपने बिस्तर पर पीठ के बल लेटे रहें। अपनी आंखों को बंद रखें, जब हम श्वास को भीतर लें तो कल्पना करें कि एक विशाल प्रकाश हमारे सर से होकर गुजर कर हमारे शरीर में प्रवेश कर रहा है। जैसे हमारे सिर के निकट ही कोई सूर्य उग आया हो। स्वर्णिम प्रकाश हमारे सिर मे ऊंडल रहा है, और गहरे से गहरा जाता जा रहा है। हमारे पंजों से बाहर निकल रहा है। जब हम श्वास भीतर लें तो इस कल्पना के साथ लें। और जब श्वास छोडे तो एक कल्पना करें, अंधकार पंजों से प्रवेश कर रहा है। एक विशाल अंधेरी नदी हमारे पंजों में प्रवेश कर रही है। ऊपर बढ़ रही है और हमारे सिर से बाहर निकल रही है। श्वास धीमी ओर गहरी रखें ताकि हम कल्पना कर सकें।
बहुत धीरे-धीरे बढ़े। बिल्कुल धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे, यह करें। सोकर उठने के बाद हमारी श्वास धीमी और गहरी हो सकती हैं। क्योंकि शरीर विश्रांत और शिथिल है।
एक बार और दोहरा लें, श्वास लेते हुए स्वर्णिम प्रकश को अपने भीतर आने दें क्योंकि वहीं पर स्वर्णपुष्प प्रतीक्षा कर रहा है, वह स्वर्णिम प्रकाश सहायक होगा, वह पूरे शरीर को स्वच्छ कर देगा। और से सृजनात्मकता से पूरी तरह भर देगा। यह पुरुष ऊर्जा है। और जब हम श्वास छोडे तो अंधकार को जितने अंधेरे की हम कल्पना कर सकते हैं, जैसे कोई अंधेरी रात के समान, अपने पंजों से इस अंधेरे को ऊपर उठने दें, यह स्त्रैण ऊर्जा है। यह हमें शांत करेगी। हमें ग्राह्यïक बनाएगी, हमें मौन करेगी। हमें विश्राम देगी, उसे अपने अपने सिर से बाहर निकल जाने दें।
देखिए, अंधकार बाहर निकल रहा है, तब फिर से श्वास लें और स्वर्णिम प्रकाश भीतर प्रवेश कर जाता है। इसे सुबह-सुबह के लिए 20 मिनट के लिए करें और दूसरा सबसे अच्छा समय है रात में, जब हम नींद में लौट रहे हों। बिस्तर पर लेट जाएं, कुछ मिनट आराम करें। और जब हमें लगे कि अब हम सोने और जागने के बीच डोल रहे हैं तो ठीक उस समय, उस मध्य में प्रक्रिया से फिर से शुरू करे दें और 20 मिनट तक जारी रखें। यदि हम इसे करते-करते सो जाएं तो सबसे अच्छा है। क्योंकि इसका प्रभाव अचेतन में बना रहेगा और वह कार्य करता चला जाएगा। महिने, दो महिने, तीन महिने की अवधि के बाद हम आश्चर्यचकित होंगे। जो ऊर्जा सतत मूलाधार पर, निम्नतम काम केंद्र पर इकट्ठी हो रही थी, अब वहां इकट्ठी नहीं हो रही है। वह ऊपर जा रही है।
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